
कायमगंज, फर्रुखाबाद, आरोही टुडे न्यूज – बीते वर्ष की भांति इस वर्ष भी दरगाह हज़रत बाबा जूही शाह रहमतुल्लाह अलैहि पर बसंत पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया पीले वस्त्र धारण कर सर पर मिट्टी की मटकी में गेहूं बाली ,कनेर,सरसों फूल,गुलाब गेंदा आम पत्ता लिए बसंत को दरगाह पर पेश किया गया पीली झंडियों से सजे दरगाह परिसर का दृश्य बड़ा ही मनमोहक लग रहा था सभी धर्मों के लोगों ने बढ़ चढ़ कर कार्यक्रम में हिस्सा लिया दरगाह के सज्जादानशीन सूफी हज़रत मुशीर अहमद क़ादरी चिश्ती वारसी से जब बसंत पर्व के बारे में पूछा गया कि बसंत दरगाहों पर कब से और क्यों मनाया जाता है ? सज्जादानशीन ने बताया कि यह महबूब इलाही हज़रत निजामुद्दीन औलिया व हज़रत अमीर खुसरो की रस्म है जो चिश्तिया सिलसिले की हर दरगाह पर मनाई जाती है इसकी शुरुआत 1253 ईस्वी से जुड़ी है आज ही के दिन यानी बसंत पंचमी के दिन अमीर खुसरो ने अपने गुरु (पीर) को मनाने और उन्हें खुश देखने के लिए पीले वस्त्र धारण कर और गीत गाकर अपने गुरु को प्रसन्न किया तब से आज तक इस रस्म को मनाया जाता है इस रस्म से जहां आपसी मोहब्बत प्रेम को बढ़ावा मिलता है वहीं अपने से बड़ों का सम्मान करने का भी सबक मिलता है दरगाहों ने हमेशा से एक दूसरे से प्रेम सेवा का भाव दिया वहीं दरगाहों ने शिक्षा पर भी जोर दिया ।

प्रोग्राम में प्रो० रामबाबू मिश्रा ने अपने कलाम में कहा कि आखिरी शब्द ईश्वर का कुरान है ,आखिरी मुस्तफा है नबुवत तेरी ,मै ब्राह्मण हूं मेरा यहां काम क्या खींच लाती है मियां मुहब्बत तेरी ! वहीं कवि पवन बॉथम ने अपने कलाम में कहा कि आज बहती हवा बसंती है,बनी तेरी हुआ बसंती है राग खुसरो का सूफियाना है आज मेला लगा बसंती है ।
फातिहा के बाद लंगर (भंडारा) का भी आयोजन किया गया जिसमें पीला हलवा पीली तहरी बांटी गई।
कार्यक्रम के समापन के दौरान सज्जादानशीन ने आए हुए सभी जायरीनों का धन्यवाद किया इस अवसर पर मसूद खान,जमीर अहमद,तौहीद अहमद,तमहीद अहमद,बबलू भाई,कवि पवन बॉथम,दिनेश वाजपई,अनुराग त्रिपाठी,सनी बॉथम,मुन्ना राजपूत,अभिषेक गुप्ता,शाहनवाज़ खान, संजय शर्मा,विनय सक्सेना,पीयूष अग्रवाल,डॉ आदित्य रतन शाक्य,अकील खान,मुनेश्वर प्रताप,डाक्टर अरशद मंसूरी, जमील भाई,हसीन सिद्दीकी आदि अकीदतमंद लोग मौजूद रहे।






