
फर्रुखाबाद , आरोही टुडे न्यूज : रहमत व बरकतों का मुकद्दस महीना चल रहा है। रमज़ान के दूसरे जुम्मे की नमाज आज अदा की गयी । आई.एस.ओ. प्रमाणित सामाजिक संगठन “मंसूरी सोसाइटी” के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं भाजपा कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के नेता डॉ. अरशद मंसूरी ने बताया कि यह महीना रहमत और बरकतों का महीना है। रमजानुल मुबारक को तीन असरा में बांटा गया है। पहला असरा रहमत, दूसरा मगफेरत और तीसरा जहन्नुम से निजात का है। उन्होंने कहा कि एक नफ़ील का सवाब फ़र्ज़ के बराबर और एक फ़र्ज़ का सवाब सत्तर फ़र्ज़ के बराबर है। उन्होंने कहा कि सालों भर रिज्क देने वाला रब अपने बंदों से इम्तिहान लेना चाहता है कि तीस दिन के लिए कौन है जो मेरे लिए खाना पीना छोड़ दे, चूंकि रोज़े का ताल्लुक अल्लाह से है और अल्लाह फरमाता है रोज़ा सिर्फ मेरे लिए है, उसका बदला मैं खुद दूँगा!
वरिष्ठ अल्पसंख्यक नेता डॉ अरशद मंसूरी ने बताया कि रमजान का पवित्र महीना उपवास, आत्मचिंतन और अल्लाह (SWT) के प्रति भक्ति का समय होता है। SWT (सुभानहु व तआला): यह वाक्यांश अरबी के दो शब्दों से बना है। ‘सुभानहु (Subhanahu)’ का अर्थ है कि ‘महिमावान या पवित्र हो वह।’ व ‘तआला (Ta’ala)’ का अर्थ सर्वोच्च या अत्यंत ऊँचा। ‘सुभानहु व तआला (Subhanahu wa ta’ala)’ का प्रयोग अल्लाह की महिमा और उच्चता को व्यक्त करने के लिए किया जाता है, जो उनके प्रति सम्मान और भक्ति दर्शाता है। चंद्र वर्ष के नौवें महीने के दौरान दुनियाभर के मुसलमान सूर्योदय से सूर्यास्त तक खाने-पीने से परहेज करते हैं और इस समय का उपयोग कुरान पढ़ने और अल्लाह (SWT) से अपने संबंध को मजबूत करने के लिए करते हैं। हालांकि, रमज़ान के दौरान रोज़ा (उपवास) रखने की प्रथा को कई लोग समझते हैं, लेकिन इसके पीछे के पूरे इतिहास की जानकारी कम ही लोगों को है। रमज़ान की जड़ों को समझने के लिए हमें 610 ईस्वी में वापस जाना होगा, वह महत्वपूर्ण वर्ष जब हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) नामक एक अरब व्यक्ति ने मक्का के पास हीरा गुफा में ध्यान किया। इस ध्यान के दौरान, फ़रिश्ता जिब्रील मुहम्मद (स.अ.व.) के पास आए और उन्होंने कुरान के पहले शब्द प्रकट किए, जिसमें बताया गया कि अल्लाह एकमात्र ईश्वर है। इसने इस्लाम की शुरुआत की और उपवास सहित उन मूल्यों की नींव रखी जो इसे परिभाषित करते हैं। उस समय अरब में बहुदेववाद प्रचलित था, लेकिन इस रहस्योद्घाटन ने एकेश्वरवाद पर केंद्रित एक नया मार्ग स्थापित किया। जिब्रील के साथ इस पहली मुलाकात को लैलातुल क़द्र (शक्ति की रात) के रूप में जाना जाता है, जिसके बारे में कई लोगों का मानना है कि यह चंद्र माह की 27वीं रात को हुई थी।
हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि सभी ईश्वरीय संदेश लैलातुल क़द्र को प्राप्त हुए, लेकिन कई मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह से 23 वर्षों तक शिक्षाएं मिलती रहीं। इन संदेशों में इस्लाम के पांच स्तंभ शामिल हैं, जिनमें से एक है रोज़ा रखना।


